इस खामोशी से
उस खामोशी तक
अल्फ़ाज़ बहुत हैं
कहने को
पर उन होंठो पे जब ताला है
कत्ल अपने अल्फाजों का
इन होठों ने भी कर डाला है।
कि बेचैन बहुत हैं धड़कन दिल कीं
और ख्वाव अधूरे हैं आंखों के
लिए समंदर घूम रहे हैं
दोनो अपने अपने जज़्बातों के
रात सुहानीं बीत रहीं हैं
कि दोनों ढूंढ रहे हैं नए तरीके
इजहारे मोहब्बत की बातों के।
इस खामोशी से
उस खामोशी तक
अल्फ़ाज़ बहुत हैं
कहने को।
कि मौसम ने भी बदली करबट
बीत गया एक और पतझड़
खामोशी की आहट में।
बंजर जमीं है सूखी सारी
आसमान भी लाल है
बूँदे भी हैं गायब लगती
आँखे भी सूख गईं हैं
खामोशी के मौसम में,
ना जाने कब बारिश होगी
ना जाने कब टूटेगी ये खामोशी
ना जाने बादल फिर कब छाएंगे जज्बातों के
ना जाने ख्वाब ये कब पूरे होंगे आँखों के।