महलों से दूर कहीं
बैठा है कोई
बदन सिकोड़े पैर मरोड़े
जो हो मुमकिन समा जाए
वो खुद में ही कहीं
तुम्हारे शहर में भी कोई
हमारे शहर में भी कोई
आँखें चियार के तो देखो
अपने महलों की छतों से
उतर के तो देखो।
देखो कोई भीग रहा है
देखो उसकी झोपड़ी के सर से
पानी टप टप टपक रहा है
देखो उसके बदन पे
अब बदन भी बाकी नहीं है
देखो उसके पेट की अंतड़ियों में
अब रोटी भी नहीं है।
महलों से दूर कहीं
बैठा है कोई…………
