प्रतीक्षा अब भ जारी है।

सूखे तनों को मिल गयीं कोपलें
प्रतीक्षा अब भी जारी है
और खिल गए सब मौसमी फूल भी
प्रतीक्षा अब भी जारी है
सावन खड़ा रुख्सत होने को
प्रतीक्षा अब भी जारी है
कि कब आओगे लौटकर
ये चहकती कोयल
ये फूलों की कलियाँ कोमल
ये सरसराती हवाओं की महक
इतंजार में इक तुम्हारे
अधूरी फिजायें अब्तर सारी हैं,
इल्म दो या इल्जाम दो
इस बार हर बारी तुम्हारी है।@ThePoetryHouse

फांसला

फ़ासला तुम्हारे
और मेरे दरम्यां
महज कुछ लफ्जों का है।
कुछ कविताएं हैं
जो सींचें हैं
एहसास तुम्हारा
और काफिला मेरे शब्दों का है।
@ThePoetryHouse

एक भोर देखा था उसको।

इक भोर देखा था
चेहरे पर कुछ काली
घटाओं के पहरे
और होंठों पर चमकता
इक काला तिल
खुदा ने भी जमीं की आराईश में
ये फूल क्या लाजबाव खिलाया है।
फ़िर नौबत मुलाकात की आती भी कैसे
खाबों में ही उस शख़्स को रब नें
वे-हिसाब मिलाया है।
सिलसिला बातों का जारी है कुछ इस तरह
एहसास उसकी ख़ामोश आँख़ों का
मैंने अपने लफ़्ज़ों में पाया है।
एक किस्से का किस्सा होना भी
मुकम्मल हो गया जो इक रोज
ख़्वाब में ही उसे सुनाया है।
अब ख़्वाहिशें जागीं हैं
तो ख़्वाहिश ये भी बाकी है
एक कोरा खत मिले उसका
और दिल की स्याही से लिखा हो
सुनो!मैंने तुम्हें अपनाया है।
खुदा ने भी जमीं की आराईस में
ये फूल क्या लाजबाव खिलाया है।
@ThePoetryHouse

किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।

किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
रेगिस्तान में भी बर्फ जमाए बैठे हैं।
कोई अपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कभी-सर्द,कभी-गर्म, कभी-तल्ख,कभी-नर्म
ये बेहोश दिन बस यूँ ही गुजर रहे हैं।
सूरज ढला दिन की लालिमा खोने को है,
एक वक्त की भूख फिर दफ़न होने को है,
और जेब में चार ही पैसे खनके हैं,पर
घर पे कुछ चेहरे उम्मीद का चूल्हा जलाए बैठे हैं।
दो पैसे छिपाकर खुद ही खुद से बेटी को बचा लिए
और भूखे पेट की तल्ख़ी पत्थर तले दवाए बैठे हैं।
वो रेगिस्तान में भी वर्फ़ जमाए बैठे हैं।
वो किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कोई आपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
@ThePoetryHouse

वो खूबसूरत दिन..

तुम मिले तो दिल गुलज़ार
और लब खिल गए,
ख़ामोश आँखों को जैसे
नए ख्वाव मिल गए।
शुक्र गुजार हूँ उस खुदा का
जो एक खूबसूरत से दिन
तुम्हें इस जमीं पे ला दिया,
मिलाकर मुझको जो तुमसे
मेरा हर ख़्वाब
मुकम्मल बना दिया।
चेहरे पर तुम्हारे तबस्सुम
बरकरार बस यूं ही रहे,
चाँदनी भी गुनगुनाये
गीत ख़ुशियों के
चाँद भी मुस्कुराता रहे।

आख़िर क्या कुछ जानकर…

आखिर क्या कुछ जानकर
कल से बेहतर हो गए
या बेख़बर हैं इस बात से
कि आज बद से बदत्तर हो गए।
अख्तर हर आँख के थे जो
क्या इल्म भी है इस बात का
सूरज ढला और बद-अख्तर हो गए।
किस हकीकत को ढूंढ़ने निकले हैं
और किस हकीकत से दूर हो गए
जो मसहूर थे अपनी खुद्दारी से
आखिर क्या बजह कि मजबूर हो गए।
खुदा जाने खुद भी ख़ुद में कहीं जिंदा हैं
या तलाश में खुद की खुद से ही दूर हो गए।
@ThePoetryHouse

आखिरी रात

वो रात सिर्फ रात नहीं थी,
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
समन्दर था जज्बातों का और डूबना मुझको था,
चेहरे का हर कोना मद्धम लौ पर उफना था
ऑंखे आसमान में ,कानों की टकटकी फ़ोन पर थी
एक धीमी सी आवाज़ पड़ी थी कानों में
सुनो! ये मेरी आखिरी कॉल है,
और जैसे एक महीन कांटा दिल के आर पार था
ऑंखे डबडबायी होंठ मानो बिन गोंद ही चिपक गए थे
कहना बहुत कुछ था मगर मानो बस सुन रहा था
ये दिल को सुकूँ देने बाले अल्फ़ाज़ आज दिल को चुभ रहे थे
मानो हजारों जल्लाद लाखों भाले जिस्म में एक साथ घोंप रहे थे
अर्से से हर कदम जो लिबास थी मेरा
बस अगले ही पल किसी और की अमानत थी
वो रात सिर्फ रात नहीं थी
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
एक समंदर था जख्मों का और डूबना मुझको था
ऑंखे फफक पड़ीं चेहरा सराबोर था,
हर ख्वाब जो साथ बुने थे
टूटते तारों से टपक रहे थे
रुँधी आवाज़ और थोड़े खुले मुँह से
बस इतना ही निकला था
हमेशा खुश रहना,मेरे हिस्से की हर खुशी जी लेना।
यूँ तो तुम….
हमेशा मेरे ख़्वाबों में, मेरी साँसो में,मेरे एहसासों में
कैसे छीनेगा तुमको कोई
तुम तो बसती हो मेरे अल्फाजों में।
ये जति धर्म कीड़े कितना बाटेंगे तुमको हमसे
मैं इनको दिखला दूंगा कितनी मोहब्बत है तुमसे
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
बात बस इतनी सी
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
वो जो घंटो हर रोज होती थीं बातें तुमसे
यूँ ही हर रोज मुक्कम्मल होगी।
बस फोन के दूसरी ओर नहीं तुम
मेरे अंदर सो बोलोगी।
अब दो नहीं चार लोग होंगे
डायरी पेन तुम और मैं।