रिप्लेसमेंट !

रिप्लेसमेंट! अक्सर मैं सोचता था मैं इसको नेगेटिव हर्जे में लूँ या पॉजिटिव, जिसको भी सुनो यही बोल रहा होता, काश! इसकी जगह मैं होता। मैं सोचता, क्यूँ हर जगह हम सबको रिप्लेसमेंट बनना होता है? किसी न किसी का, निजी जिंदगी हो या फिर सोशल। ह्यूमन नेचर है, कुछ ऐसे ही काम करता है शायद। कई बार जिंदगी मौका देती है, या तो हम खुद ही मौके तलासने में जुट जाते हैं कि कब मौका मिले और हम फटाक से किसी को रिप्लेस कर दें।

अपने घर को ही लीजिये, जब भी कोई हमेशा के लिए हमसे दूर जाता है, एक खाली स्पेस छोड़ जाता है। फ़िर हम कोशिश करते हैं कि उस शख़्स का रिप्लेसमेंट कर दें और उस खाली स्पेस को भर दें, उसकी सारी जिम्मेदारियां अपने कांधे पे ले लें।

बात कुछ आठ साल पुरानी है, पापा हमें छोड़ के जा चुके थे, घर जो अब कहीं बचा ही नहीं था, मानो सबकुछ टुकड़ों में बिखर गया था और उसके ऊपर से छत गायब हो गई थी। मैं घर में सबसे छोटा था, भईया अपनी इंजिनीरिंग की पढ़ाई के लिए कॉलेज में रहते थे और दीदी अपने ससुराल जा चुकी थीं। चूँकि मैं पापा के ज्यादा करीब था तो मुझे उनके वर्क मैनेजमेंट का ज्यादा आईडिया था। पापा को काम में मदद करते ये भी आईडिया हो गया था कि कैसे भईया की पढ़ाई के लिए महीने के पाँच दिन पहले से ही पैसों का इंतजार करने में जुट जाते थे और भईया के फोन आने के पहले पैसा जुटा ही लेते थे।पापा साथ रहके थोड़ा बहुत किसानी भी सीखा था पर अपने पास उतनी खेती नहीं थी जिससे सारे ख़र्च पूरे हो सकें। पापा लीज पे लेकर खेती कर लेते थे।

पापा के जाने के बाद जो खाली स्पेस था इतना बड़ा था कि पूरा ब्रह्मांड उसमे समा जाए। अभी वक्त था कि किसी को तो उस स्पेस को भरना है, अभी वक्त था कि टुकड़ों में बिखरे घर को जोड़ना है। पर सवाल था कि वो रिप्लेसमेंट आखिर करेगा कौन, चूंकि भईया ज्यादा दिन घर नही रुक सकते थे तो कुछ दिन ऐसे ही गुजरे, पर अब हालात बिगड़ने लगे थे माँ पूरे दिन इधर से उधर भागती रहती इसी उम्मीद में कि वो सब कुछ सही कर देंगीं लेकिन उनकी तवियत भी अब बिगड़ने लगी थी और वो खाली स्पेस अब और खाली सा लगने लगा था।
भाई भी पैसा नहीं मांग रहा था पर बिना पैसे के शहर में कैसे चलेगा तो उसने अपनी पढ़ाई बंद करने का सोच लिया था। अब मझे पैसों का इंतजाम करना था वो भी बिना किसी को बताए। स्कूल के बाद खाली टाइम में मैं देखने लगा कि मैं क्या कर सकता हूं जहाँ से कुछ पैसे का जुगाड़ हो जाये एक दो काम जगह काम करके थोड़ा पैसा जमा किया और इस महीने भईया को बिना बताए मैंने पैसे भेज दिए। उस टाइम एक ही फोन हुआ करता था जो घर पे रहता था, भईया हफ्ते में एक दो बार फ़ोन करता था कॉलेज के फ़ोन से, पर उसे अगले 15 दिन तक पता ही नहीं चला कि उसके बैंक में पैसे आ गए हैं।

एक दिन शाम को मैं घर लौटा, माँ के दरवाजा खोलते ही मैंने उनकी आंखों में ऑंसू और एक सवाल देखा, तू इतना बड़ा कब हो गया रे आशू?? कब??? उस वक्त उन्होंने कुछ नहीं बोला और मैं भी अपने कमरे में चला गया। रात में जब माँ के साथ खाना खा रहा था तो उन्होंने चुपके से बोला, आशू…… तूने सारे गुण पापा के ले लिए ना। मैं समझ गया आज भईया को पता चला है कि उनके बैंक में पैसे आ गए हैं।
किधर से आये पैसे??? तू स्कूल नहीं जाता क्या??? मां बोले जा रहीं थीं।
मैं चुप था, मैं बोलना चाहता था, माँ अब सब कुछ थोड़ा-थोड़ा ठीक हो जाएगा। पर बोलने की हिम्मत नहीं थी। उसके बाद तीन दिन माँ मुझसे कुछ भी नहीं बोली। चौथे दिन जब घर लौटा तो मेरे हाथ में एक छोटा सा लड्डू का डिब्बा था आज मुझे एक ऑटो गैराज में परमानेंट नौकरी मिल गई थी स्कूल से आने के बाद वहाँ चार घण्टे काम करना था। मैंने माँ को लड्डू खिलाया और बोला माँ…. अब सब कुछ ठीक हो जाएगा। मैं उस दिन भईया को बोलना चाहता था कि अब उसे पढ़ाई बन्द करने की कोई जरूरत नहीं है उसके लिए पैसा मैं हर महीने भेज दिया करूँगा और घर के खर्चे के लिए माँ कमा ही लेती है।
पर उस दिन फ़ोन नहीं लगा, मैं अक्सर दिन मैं बाहर रहता था और उसको दिन में ही फोन करने के लिए मौका मिलता था। अब मैं इतवार के इंतजार में था। इतबार को सुबह सुबह ही जब माँ घर पे नहीं थीं तो मैंने फ़ोन लगा दिया, इससे पहले कि मैं कुछ बोलता, उधर से आवाज़ आयी तुझे पता है मैं तुझसे हमेशा बोलता था तू पापा पे गया है, उसकी आवाज़ भारी हो रही थी। आशू, आज तुझे…. और हम दोनो रो दिए। भईया अब आपको पढ़ाई नहीं छोड़नी है जब आप नौकरी करोगे तो मैं पढ़ाई करूँगा, मैं बस इतना बोल पाया कि फोन का बैलेंस खत्म हो गया। उस दिन पहली बार लगा था कि जैसे मैं पापा की खाली जगह को भर पाउँगा, मैं टुकड़ों को फिर से घर बना पाउँगा, मैं पापा का रिप्लेसमेंट बन पाउँगा।

आज पूरे आठ साल से ज्यादा हो चुके हैं, भईया एक मल्टीनेशनल कंपनी में जॉब करते हैं मुझे भी एक सरकारी नौकरी मिल गई है। सब कुछ पटरी पे लौट आया है, पर जो खाली स्पेस पापा छोड़ के गए वो अब भी उतना ही खाली है बस इतना हुआ है कि एक खाली समंदर में कुछ बूंदे बरस गईं हैं।

अब कई सवाल जो अब बार बार दिमाग को टक से छू के निकल जाते हैं। क्या बाकई किसी का रिप्लेसमेन्ट किया जा सकता है?? क्या किसी इंसान की अच्छाइयों और खामियों को रिप्लेस किया जा सकता है?? क्या किसी के दुनियां से जाने के बाद उसकी कमी को पूरा महज उसकी जिम्मेदारियों को निभा कर पूरा किया जा सकता है??

Leave a comment