वक्त के शहर का इक परिंदा हर शाम गुजर जाता है।

वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
है खौफ अंधेरों से उसको
पर बयाँ वो करता नहीं
डरता है कुछ इसकदर
की धड़कने छोड़ दिल
पेट को उतर जाता है।
आ गया जो इक पैगाम
उसके शहर नए मुसाफिर
उम्र पूरी कर वो अपनी
छोड़ सूना शहर
इक नए सफर जाता है।
वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
बिदाई में आती है बारात उसके
शहर के नन्हें परिंदों की
जो रोकना तो उसको सब चाहें
पर अब उसको जाना है
जाते जाते फिर लौटने का
वादा वो कर जाता है।
भोर हुई वो लौट आता है
वो नहीं तो उसका
हमशक्ल आता है
फिर उम्मीद से भर
सारा शहर जाता है।
पर परिंदे का क्या
आता है जाता है
हर बार निकल
किसी नए सफर जाता है।
वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
बिदाई में आती है बारात उसके
शहर के नन्हें परिंदों की
जो रोकना तो उसको सब चाहें
पर अब उसको जाना है
जाते जाते फिर लौटने का
वादा वो कर जाता है।
वक्त के शहर का एक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
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अब क्या नाम दू उनको
अब क्या दाम दू उनको
उनसे ही शुरू ये फखत दुनिया मेरी,
होती उनपे ही खत्म
अब और क्या अंजाम दू उनको।

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जुर्म अगर मेरे हैं
तो हर इल्ज़ाम भी आये मेरे हिस्से
तुम वक्त को भी इतना मजबूर कर दो
कि दाग भी आये तुम्हारे दामन
इससे पहले
तुम मेरी बेबफाई मशहूर कर दो
और जला दो मिरे हर तोहफे को तुम
जो आह भी ना सुन सकूँ मैं खुद की
मुझे भी मुझसे इतना दूर कर दो।
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फूल भी देखो कितने fool बन रहे हैं।

बेचारे फूल भी देखो
कितने फूल बन रहे हैं।
ज्ञानी हो या अज्ञानी
शाही हो या अपराधी
गूँथ मालाओं में सबके
गले का हार बन रहे हैं।
वे जान हैं वे जुबान हैं
पर उनका भी तो
अपना स्वाभिमान है
कुछ कह नहीं सकते
कुछ कर नहीं सकते
है क्रोध की लालिमा
कण कण में भर गई पर
अपने ग़ुस्से का इजहार
बस मुरझाकर कर रहे हैं।
बेचारे फूल भी देखो
कितने फूल बन रहे हैं।
ये चलते फिरते माटी के पुतले
जो कुदरत से जंग का
आहवान कर रहे हैं
ये घोर कलयुग का प्रतीक है
गुँथी मालाओं की महफ़िल में
चर्चा ये फूल सारे
सरे – आम कर रहे हैं।

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जलाकर मुझको
वो चैन से ना सोये होंगे
कि मेरे चाहने बाले
लिपटकर मेरी खाक से
वो रोये होंगे।
जिन आँखों को नागवार थी
मेरी धुँधली सी सूरत
मातम में मेरे वो भी आये होंगे
और देखना ये कितना
दिलचस्प रहा होगा
की छिपाकर मुस्कान वो मन की
आँसू बहाए होंगे।
पढ़े होंगे कुछ अफसाने मेरी जिंदगी के
कुछ मिसरे मेरी तारीफ में भी गाए होंगे।

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तमाशबीन राजा

राजा छठा हुआ तमाशेबाज है,अपनी प्रजा के मनोविज्ञान से अवगत है राजा जनता है कि अमीर गरीब ज्ञानी अज्ञानी कोई हों सब तमाशा घुस के देखते हैं।तमाशे बाजी से एक बार प्रजा के सम्मोहित होते ही राजा और प्रजा में टयूनिंग गजब की बन जाती है।राजा अगर सिर पीटने को भी बोले तो प्रजा ताली पीटने लगती है।राजा भी ठहरा गजब तमाशबीन उसने सुशासन के लिए तमाशाई शैली अपनायी।लोगों ने साफ पानी के लिए आवाज़ उठाई राजा ने बहती नदी पर हवाई जहाज तेरा दिया।बस्ती में आग लग गयी राजा ने आग में लगे गोल चक्कर से आर पार कूदना शुरू के दिया।प्रजा से महंगाई पर ध्यान देने को बोला राजा गुफा में ध्यान लगा कर बैठ गया।प्रजा ने स्कूल अस्पताल की मांग उठाई राजा ने पड़ोसी देश के आक्रमण का भय दिखाकर खाली बोतल में रख रख कर रॉकेट छोड़ने शुरू कर दिए।प्रजा काम की बात पूछती राजा मन की बात करने लगता।पर राजा जनता है तमाशा की अपनी खामी और खूबी दोनों हैं।
खूबी ये कि तमाशे के खेल में प्रजा मूल मुद्दा भूल जाती है।और खामी ये की हर बार नया दिखाना पड़ता हैं।

तुम्हारी कमीं सी क्यूँ है।

आजकल मिरे हिस्से
तुम्हारी कमीं सी क्यूँ है।
हर किस्से में आहट
तुम्हारी दबी सी क्यूँ है
रहते आस पास ही
पर बोलते कुछ नहीं
अब तुम भी बताओ
चेहरे पे ये तुम्हारे
इतनी नमीं सी क्यूँ है।
आजकल मिरे हिस्से
तुम्हारी कमीं सी क्यूँ है।
रूह में रूह बसती है
जिस्म में भी अंश तुम्हारा
जो तुम हो ख़ामोश इतने
तो मिरा बेहोश रहना लाज़मी
पर तुम बताओ धड़कनें तुम्हारी
इतनी थमी सी क्यूँ हैं।
रहते आस पास ही
पर बोलते कुछ नहीं
अब तुम भी बताओ
चेहरे पे ये तुम्हारे
इतनी नमीं सी क्यूँ है।

@The

PoetryHouse

प्रतीक्षा अब भी जारी है।

सूखे तनों को मिल गयीं कोपलें
प्रतीक्षा अब भी जारी है
और खिल गए सब मौसमी फूल भी
प्रतीक्षा अब भी जारी है
सावन खड़ा रुख्सत होने को
प्रतीक्षा अब भी जारी है
कि कब आओगे लौटकर
ये चहकती कोयल
ये फूलों की कलियाँ कोमल
ये सरसराती हवाओं की महक
इतंजार में इक तुम्हारे
अधूरी फिजायें अब्तर सारी हैं,
इल्म दो या इल्जाम दो
इस बार हर बारी तुम्हारी है।@ThePoetryHouse

फांसला

फ़ासला तुम्हारे
और मेरे दरम्यां
महज कुछ लफ्जों का है।
कुछ कविताएं हैं
जो सींचें हैं
एहसास तुम्हारा
और काफिला मेरे शब्दों का है।
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एक भोर देखा था उसको।

इक भोर देखा था
चेहरे पर कुछ काली
घटाओं के पहरे
और होंठों पर चमकता
इक काला तिल
खुदा ने भी जमीं की आराईश में
ये फूल क्या लाजबाव खिलाया है।
फ़िर नौबत मुलाकात की आती भी कैसे
खाबों में ही उस शख़्स को रब नें
वे-हिसाब मिलाया है।
सिलसिला बातों का जारी है कुछ इस तरह
एहसास उसकी ख़ामोश आँख़ों का
मैंने अपने लफ़्ज़ों में पाया है।
एक किस्से का किस्सा होना भी
मुकम्मल हो गया जो इक रोज
ख़्वाब में ही उसे सुनाया है।
अब ख़्वाहिशें जागीं हैं
तो ख़्वाहिश ये भी बाकी है
एक कोरा खत मिले उसका
और दिल की स्याही से लिखा हो
सुनो!मैंने तुम्हें अपनाया है।
खुदा ने भी जमीं की आराईस में
ये फूल क्या लाजबाव खिलाया है।
@ThePoetryHouse