तोहफा फिर इस बार नहीं कोई।

इस बार भी खाली हाँथ आया हूँ,माफ करना दोस्त ,इस बार कुछ भी नहीं है जो तुम्हें दे पाऊँ।
जन्म दिन की बहुत सारी शुभकामनाएँ,मेरी दोस्त।हर सुबह तुम्हारे लिए एक नयी खुशी लेकर आये।यही कामना करता हूँ।
यूँ ही मुस्कुराते रहना,अब नाराज न होना हर बात पर,न ही गुस्सा करना।
Sorry! इसबार सबसे पहले तो विश नहीं कर पाया,क्योंकि अब वो हक खो चुका हूँ, पर उम्मीद है कि सबसे आखिरी तो नहीं होऊँगा।

मेरी डायरी में तो सबसे पहले ही किया था क्योंकि वहां पर तो मेरा पूरा हक है।और आगे भी मेरी डायरी जिसके किरदार तुम हो सबसे पहले ही विश करता रहूँगा।

कोई तोहफा तो नहीं पर एक कविता है,शायद तुम्हें पसंद आये।
वैसे कविताये बहुत सारी हैं,पर

कुछ कविताएं अब राज ही रहने देते हैं
कुछ अल्फ़ाज़ हैं जिन्हें अब महज अल्फ़ाज़ ही रहने देते हैं,
यूँ तो तुम मेरी हर खुशी में सरीक रहती हो और रहोगी,
पर कुछ गम भी हैं उन्हें अपने ताज ही रहने देते हैं।

तोहफा कोई फिर
इस बार नही दोस्त,
माफी फिर इसबार चाहता हूँ,
अगली बार का इंतजार चाहता हूँ
बस एक इजाजत और चाहता हूँ
मैं तुम्हें हमेशा मेरी दोस्त चाहता हूँ,
तुम्हारी हर मजबूरी को तुमसे बेहतर जानता हूँ,
मैं तुम्हारी हँसी बेहद पहचानता हूँ,
सारी खुशियाँ तुम्हारे हिस्से बाँधता हूँ,
बचते हैं गम, मैं अपने हिस्से चाहता हूँ,।
तुम्हारे इस खूबसूरत चेहरे ये मुस्कुराहट बनी रहे
बस खुदा से यही दुआ हर शाम चाहता हूँ।

पता नहीं ये खाली हाथ जन्मदिन की मुबारकबाद का सिलसिला कब तक चलेगा।
पर वादा करता हूँ,एक दिन सारे तोहफे एक साथ दूँगा, सारा हिसाब बाकी रखना।
सबसे खूबसूरत तोहफा तो नहीं पर सबसे अलग तोहफा जरूर होगा।शायद मेरी जिंदगी का सबसे ख़ूबसूरत पर तुमसे ज्यादा नहीँ।
वैसे अपनी जिन्दगी का सबसे खूबसूरत तोहफा तो खो चुका हूँ।

अगर जिंदगी रही तो मुक्कम्मल जरूर होगा
सारे तोहफों का हिसाब एक साथ हुजूर होगा,
न जाने कब आएगा बो दिन पर
वादा रहा वो दिन बहुत मसहूर होगा।

बस इसी उम्मीद के साथ कि तुम्हें पसन्द आएगा,मैं इस सफर पर चल पड़ा हूँ,पर खत्म कब होगा ये तो पता नहीं,शायद ये अब तक का सबसे कठिन सफर है आसान बिल्कुल भी नहीं है पर मुश्किल भी नहीं।तुम्हारे मुस्कुराते चेहरे को देखने की उम्मीद ये सफर थोड़ा आसान बना देगी।

इस बार फिर खाली हाँथ आने के लिए माफ कर देना प्लीज।
Sorry !
मेरी दोस्त।
यूँ ही मुस्कुराते रहना।

तुम मिले ख़्वाब मिला!

तुम मिले
ख़्वाब मिला
दिल मिले
जबाव मिला
फिर क्या था
हर लम्हा
लाजबाब मिला
तुम मिले
ख़्वाब मिला
दिल मिले
जबाव मिला,
रिस्ते भी मिले
फ़रिश्ते भी मिले
तुम जैसा न कोई
जनाब मिला,
ऐ-खुदा
अब तू ही बता
इंसाँ मिला या
तेरा कोई
खिताब मिला।
तुम मिले
ख़्वाब मिला
दिल मिले
जबाव मिला।

@विकासडायरी

तुम साथ होते तो कितना बेहतर होता!

तुम साथ होते तो कितना बेहतर होता,
मैं थकता नहीं,मैं रुकता नहीं,
हर मुश्किल के आगे झुकता नहीं,
कूद जाता मैं हर समंदर में
बस हाथ में हाथ तुम्हारा होता।
तुम साथ होते तो कितना बेहतर होता,
रातें नींद लेकर आतीं,
सुबह एक सुनहरी धूप होती,
तुम साथ होते तो कुछ भी ना खोता।
तुम साथ होते तो कितना बेहतर होता
हर गम बाँट लेते हम,
खुशियों पे हक बस हमारा होता।
जिंदगी की रफ्तार भी थमती
वक्त भी ठहरा होता
खावों पर भी हमारा पहरा होता
जब आमने सामने हमारा चेहरा होता।
तुम होते तो कितना बेहतर होता।
आखिर अब भी क्यों नहीं समझा पाता
मैं खुद को
कि अब तुम नहीं हो
और अगर तुम नहीं हो तो ये ख़्वाब क्यों हैं
और अगर ख़्वाब हैं तो तुम क्यों नहीं हो
और अगर तुम नहीं हो तो ये एहसास क्यों हैं
और अगर एहसास हैं तो तुम क्यों नहीं
मेरे हर अलफ़ाज़ में बस तुम्हारा ही नाम क्यों है
और अगर तुम्हारा नाम है तो तुम क्यों नहीं
अब कौन है और कौन नहीं
अब ये खेल मुझसे और नहीं खेला जाता
अगर आने बाला अपने ख़्वाब लेकर साथ आता है
तो फिर जाने वाला इन्हें साथ लेकर जाना भूल क्यों जाता है।
आना जाना जरूरी है क्या
कोई आकर ठहर क्यो नहीं जाता है,

@विकासडायरी

तेरा इंतजार!

हा मैं तेरा , घड़ियों इंतजार करता हूँ…….
है खबर, क्या तुझे , मैं चुपके चुपके तेरा दीदार करता हूँ….
कैसे कहूँ हाँ कैसे कहूँ तेरी उस छोटी सी मुस्कान पर मरता हूँ..
हाँ मैं तेरा ,घड़ियों इंतजार करता हूँ..
जब भी तुझे घूरे कोई मुझसे पूछो शोलानुमा जलता हूँ…..
घनी अँधेरी रातों में घँटों उस ओझल सी चांदनी में बस तेरा ही दीदार करता हूँ…..
अब तुम ही कहो क्या मैं तुमसे प्यार करता हूँ…
कि आज बोल ही दूँगा मैं बस रात गुजरने का इंतजार करता हूँ..
अब तुम ही कहो क्या मैं तुमसे प्यार करता हूँ……
है खबर क्या तुझे ,मैं चुपके चुपके तेरा ही तो दीदार करता हूँ….

@विकासडायरी

इक तमन्ना

माँ हिंदी और उर्दू
का मान बढ़ाने का
हुनर चाहता हूँ।
भले होंठ ख़ामोश रहें
लफ्ज़ भी मौन रहें
दिल की स्याही और
मन की कलम से
लिख पाऊँ हर हकीकत
बन जाऊँ आवाज़
हर मौन की
वो स्वर चाहता हूँ।
माँ भारती के सम्मान
में गर कट भी जाये
वो सर चाहता हूँ।
ख़्वाब बहुत नहीं
पर तमन्ना ये है
कि हर बेघर को
दे पाए महफूज आसरा
एक ऐसा घर चाहता हूँ।

@विकासडायरी

प्रेमचंद्र एक झलक में

कलम से इस अज़ीम योद्धा को नमन।
सोचता हूँ कितना दर्द रहा होगा
जो आँसू बनकर
बूँद-बूँद कलम से बहा होगा,
जब पूस की रात लिखा होगा।
रूबरू इस वहशी जमात से
कितना बेहतर रहा होगा
जब तहरीर सा अज़ाब
लफ्जों से शब्दों में ढहा होगा।
पढ़ा होगा सियासत के हर पहलू को
कितना खोद खोद कर
यूँ ही नहीं नमक का दरोगा कहा होगा।
कितने करीब से जिया होगा
उस मजलूम गरीबी को
कि सवा सेर गेंहूँ का कर्ज
भी ताउम्र चुकाता रहा होगा।
गुजरी सारी जिंदगी चीथड़ों में
मौत पर भी जो अपनो की
दो गज कफ़न ना अदा कर सका होगा।
और उसी दौर में लिख रहा था वो
ईदगाह सी महफूज़ इंसानियत
और ज्योति सा ममता का राग
बाकई माँ हिंदी को जीने बाला
वो अदभुत शख़्स
कितना अज़ीम रहा होगा।

@विकास डायरी

तुम आ रहे हो ना।

सुनो!चाँद को रोका है
एक और रात के लिए
तुम आ रहे हो ना
मुलाकात के लिए
वक्त ना हो अगर
फिर इस बार भी
तो कोई गिला नहीं
बस एक टक तुम
आसमां देख लेना
मैंने घर बना रखा है
इसे आज रात के लिए
फुरसत गर इतनी भर
भी न मिले
तब भी कोई गिला नहीं
फिर उधार लेंगे आसमां
किसी और रात के लिए।

@विकासडायरी

सुनो!कलम बोल रही है।

सुनो!कलम बोल रही है,
पर दोष मुझे मत देना तुम
अपने गहरे दबे राज
ये खुद खोल रही है
सुनो!कलम बोल रही है।
तन्हां अक्स मेरा अब
कलम ओढ़ लेता है
है खुद भी तन्हा पर
आँसू मिरे झेल रही है।
बहुत लिखा इसने हमको
कमबख्त बस तुम्हें लिख रही है
तुम्हारे गर्म हाथों की नरमी
खफ़ा है एक अरसे से
बेचैन कलम लिपट कर
खामोश अक्स से मेरे
इंतजार के रंग का
हर अफ़साना लिख रही है
ख़ामोश सिले होंठो को
अब ये खोल रही है
सुनो!कलम बोल रही है।

@विकासडायरी