किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
रेगिस्तान में भी बर्फ जमाए बैठे हैं।
कोई अपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कभी-सर्द,कभी-गर्म, कभी-तल्ख,कभी-नर्म
ये बेहोश दिन बस यूँ ही गुजर रहे हैं।
सूरज ढला दिन की लालिमा खोने को है,
एक वक्त की भूख फिर दफ़न होने को है,
और जेब में चार ही पैसे खनके हैं,पर
घर पे कुछ चेहरे उम्मीद का चूल्हा जलाए बैठे हैं।
दो पैसे छिपाकर खुद ही खुद से बेटी को बचा लिए
और भूखे पेट की तल्ख़ी पत्थर तले दवाए बैठे हैं।
वो रेगिस्तान में भी वर्फ़ जमाए बैठे हैं।
वो किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कोई आपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
@ThePoetryHouse
तुम मिले तो दिल गुलज़ार
और लब खिल गए,
ख़ामोश आँखों को जैसे
नए ख्वाव मिल गए।
शुक्र गुजार हूँ उस खुदा का
जो एक खूबसूरत से दिन
तुम्हें इस जमीं पे ला दिया,
मिलाकर मुझको जो तुमसे
मेरा हर ख़्वाब
मुकम्मल बना दिया।
चेहरे पर तुम्हारे तबस्सुम
बरकरार बस यूं ही रहे,
चाँदनी भी गुनगुनाये
गीत ख़ुशियों के
चाँद भी मुस्कुराता रहे।
आखिर क्या कुछ जानकर
कल से बेहतर हो गए
या बेख़बर हैं इस बात से
कि आज बद से बदत्तर हो गए।
अख्तर हर आँख के थे जो
क्या इल्म भी है इस बात का
सूरज ढला और बद-अख्तर हो गए।
किस हकीकत को ढूंढ़ने निकले हैं
और किस हकीकत से दूर हो गए
जो मसहूर थे अपनी खुद्दारी से
आखिर क्या बजह कि मजबूर हो गए।
खुदा जाने खुद भी ख़ुद में कहीं जिंदा हैं
या तलाश में खुद की खुद से ही दूर हो गए।
@ThePoetryHouse
वो रात सिर्फ रात नहीं थी,
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
समन्दर था जज्बातों का और डूबना मुझको था,
चेहरे का हर कोना मद्धम लौ पर उफना था
ऑंखे आसमान में ,कानों की टकटकी फ़ोन पर थी
एक धीमी सी आवाज़ पड़ी थी कानों में
सुनो! ये मेरी आखिरी कॉल है,
और जैसे एक महीन कांटा दिल के आर पार था
ऑंखे डबडबायी होंठ मानो बिन गोंद ही चिपक गए थे
कहना बहुत कुछ था मगर मानो बस सुन रहा था
ये दिल को सुकूँ देने बाले अल्फ़ाज़ आज दिल को चुभ रहे थे
मानो हजारों जल्लाद लाखों भाले जिस्म में एक साथ घोंप रहे थे
अर्से से हर कदम जो लिबास थी मेरा
बस अगले ही पल किसी और की अमानत थी
वो रात सिर्फ रात नहीं थी
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
एक समंदर था जख्मों का और डूबना मुझको था
ऑंखे फफक पड़ीं चेहरा सराबोर था,
हर ख्वाब जो साथ बुने थे
टूटते तारों से टपक रहे थे
रुँधी आवाज़ और थोड़े खुले मुँह से
बस इतना ही निकला था
हमेशा खुश रहना,मेरे हिस्से की हर खुशी जी लेना।
यूँ तो तुम….
हमेशा मेरे ख़्वाबों में, मेरी साँसो में,मेरे एहसासों में
कैसे छीनेगा तुमको कोई
तुम तो बसती हो मेरे अल्फाजों में।
ये जति धर्म कीड़े कितना बाटेंगे तुमको हमसे
मैं इनको दिखला दूंगा कितनी मोहब्बत है तुमसे
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
बात बस इतनी सी
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
वो जो घंटो हर रोज होती थीं बातें तुमसे
यूँ ही हर रोज मुक्कम्मल होगी।
बस फोन के दूसरी ओर नहीं तुम
मेरे अंदर सो बोलोगी।
अब दो नहीं चार लोग होंगे
डायरी पेन तुम और मैं।
ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं
अब खुद से ही
शर्मिंदा हूँ मैं
ठहरा वक्त का पाबंद
पर वक्त ठहरा कहाँ
कभी जाबांज मुसाफिर
अब वे जान परिंदा हूँ मैं
ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं,
गला घोंट दूँ खुद का
पी जाऊँ खून भी
अब बो दरिंदा हूँ मैं
अब खुद से ही
शर्मिंदा हूँ मैं,
चला था कई
हसीन ख़्वाब लेकर
कुछ नग्न आँखों को
उम्मीद की लौ देकर
अब माटी सा मौन
बस जुर्मों का
पुलिंदा हूँ मैं,
ये मजबूर सियासत
ठुकरा ही चुकी हैं
खुदा भी मुकर जाए
अपनी जमानत से
वो अश्क़िया इंसान
चुनिंदा हूँ मैं
ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं।
हाँ मैं अब सुकूँ चाहता हूँ,पर मैं तुम्हें चाहता हूँ। हाँ मैं अब घंटो की नीद चाहता हूँ,पर गोद तुम्हारी चाहता हूँ। हाँ मैं अब और जीना चाहता हूँ,पर जिंदगी बस तुम्हारे साथ चाहता हूँ। हाँ मैं दूर बहुत दूर जाना चाहता हूँ,पर कंधे पर तुम्हारा हाथ चाहता हूँ। हाँ मैं अब सुकूँ चाहता हूँ,पर मैं तुम्हें चाहता हूं। निःशंकोच बहुत खामियाँ हैं मुझमें,पर मैं हर शिकायत बस तुमसे चाहता हूँ, और बस शिकायत ही नहीं मैं हर खामी की सजा बस तुमसे चाहता हूँ। हाँ मैं हर जंग फतह कर लूँगा, बस तुम्हारे चेहरे पर मुस्तुकिल चाहता हूँ, हाँ मैं हर ज़ख्म सह लूँगा,बस तुम्हारे होंठो पर तबस्सुम चाहता हूँ। हाँ मैं अब सुकूँ चाहता हूँ पर मैं तुम्हें चाहता हूँ। @विकास डायरी
तुझको मुझसा कोई ना चाहेगा वस तुझे समझ मे आना बाकी है, मेरी दोस्त दिल टूट गया तो रोना क्यों यादों का खजाना अभी बाकी है,मेरी दोस्त तेरी यादों की तेरी बातों की सौगात सजाये बैठे हैं तेरे साथ बिताए लम्हों के जज्बात सजाये बैठे हैं जब प्यार हमारा सच्चा था तो क्यों आंशू बर्बाद करें हम हम तन्हाई और जाम के संग हर रात सजाये बैठे हैं तेरी कमीं तो है लेकिन आँखों मे नमीं मेरे यार नहीं तुझको बेवफा कोई कह दे ये भी स्वीकार मेरे यार नहीं तेरी हर मजबूरी को तुझसे बेहतर जनता हूँ, तेरी हर हँसी को तुझसे बेहतर पहचानता हूँ।
नया नया जहांन चुन रहे हो तुम जानता हूँ आसमान चुन रहे हो तुम इस भीड़-भाड़ की बस्ती इंसाँ मुक्कमल नहीं और भगवान चुन रहे हो तुम और भगवान चुन रहे हो तुम। जानता हूँ आसमान चुन रहे हो तुम ये जिंदगी तुम्हारी है और फ़ैसले भी तुम्हारे कुछ तजुर्बेकार हिदायद दे गए हैं क्या कान लगा कर सुन रहे थे तुम, दो गज जमीं से ताल्लुकात बनाये रखना कुछ रिश्ते अपनों से सजाए रखना ये नफरती हवाएँ निस्तो-नाबूत न कर दें जड़ें जरा जमीं में धसाएँ रखना तुम कुछ रिश्ते अपनों से बनाये रखना तुम।
ये कैसी हकीकत जिंदा हूँ मैं अब खुद से ही शर्मिंदा हूँ मैं ठहरा वक्त का पाबंद पर वक्त ठहरा कहाँ कभी जाबांज मुसाफिर अब वे जान परिंदा हूँ मैं ये कैसी हकीकत जिंदा हूँ मैं, गला घोंट दूँ खुद का पी जाऊँ खून भी अब बो दरिंदा हूँ मैं अब खुद से ही शर्मिंदा हूँ मैं, चला था कई हसीन ख़्वाब लेकर कुछ नग्न आँखों को उम्मीद की लौ देकर अब माटी सा मौन बस जुर्मों का पुलिंदा हूँ मैं, ये मजबूर सियासत ठुकरा ही चुकी हैं खुदा भी मुकर जाए अपनी जमानत से वो अश्क़िया इंसान चुनिंदा हूँ मैं ये कैसी हकीकत जिंदा हूँ मैं।
उस दिन फोन कैसे कट गया पता नहीं,मुझे लगा तुमने काट दिया ,शायद तुम सोच रही होगी मैनें काट दिया।और कविता यूँ ही अनकही रह गई,खैर शायद अब तुम्हारी तरह अब तुम्हें कविता सुनाना अब नसीब में न हो।
बस यही सोचता हूँ फिर किसी मोड़ पर मिलेंगे
सारी कविताएं फिर एक साथ तेरे नाम पढेंगे।
मैं फोन दोबारा कर सकता था,पर उस आखिरी किए वादे को बिलखता कैसे छोड़ देता,वादा सांसे तोड़ देता तो शायद मैं भी। अब बो सिर्फ वादा नहीं उससे कहीं ज्यादा है।खैर कविता नसीब में होगी मेरे तो किसी दिन एक बड़े से इवेंट में तुम सामने बैठी होगी तब सुनाउँगा।
बाकी डायरी को तो हर रोज ही सुनाता हूँ।
बीते कुछ दिनों में मैन जो भी किआ उस सबके लिए माफ करना आसान नहीं होगा तुम्हारे लिए मुझे।मेरी सारी गलतियों केे लिए मुझे माफ़ तो नहीं किया जा सकता । शायद कभी नहीं।
बस एक ख़्वाहिश रखता हूँ , तुम्हें अपनी डायरी का किरदार हमेशा हमेशा के लिए रखने की इजाजत चाहता हूँ।और एक दोस्त भी चाहता हूँ,इजाजत हो तो तुम्हें हमेशा मेरी दोस्त कहना चाहता हूँ।
तुम बाकई दिल से लेकर हर एक चीज में बहुत खूबसूरत हो,बस एक तुम जैसा दोस्त चाहता हूँ, जानता हूँ ये हम दोनों के लिए आसान नहीं है।
तू मां गँगा सी पवित्र है
चाँद पर दाग सा मेरा चरित्र है
मर्यादा सी सखी हैं तेरी सहेलियाँ
एक कवि आवारा सा मेरा मित्र है।
हम दोनों कभी एक नहीं हो सकते ये मैं भी जानता पर मैं डरपोक था मैंने तो कोशिस भी नहीं की बस इसी बात का अफसोस ताउम्र रहेगा।एक दिन तो तुम चली ही जाती पर अचानक से तुम्हारा चले जाना मुझे बहुत तोड़ गया है। पर उस सब का गुनाहगार तो मैं ही हूँ, उसकी सजा अब झेल रहा हूँ।बस हर रोज यही कोशिस कर रहा हूँ ,अपने आप को जोड़कर रख पाऊँ।क्योंकि अब आगे का सफर तो पूरा करना ह,उसे पूरा करने के लिए बहुत मेहनत और तुम्हारे साथ की जरूरत होगी।तुम शयाद ही अब साथ निभा पाओ,तुम्हारे लिए भी आसान नहीं होगा।
तुमसे कोई शिकायत नहीं है,तुम्हारी जिन्दगी में जो भी शख्स आये, तुम्हें बहुत खुश रखे जो मैं कभी नही कर पाया।बस कुछ अफसोस अपने ऊपर हमेशा रहेंगें, और रहने भी चाहिए मुझे मेरी गलतियाँ याद दिलाते रहेंगे।
खैर जिंदगी तो छोटी ही होती है,उसमे से भी कुछ खूबसूरत लम्हे मेरे हिस्से बांध देना बाकई बहुत खास है मेरे लिए।
इस पर अगर मैं दोष नियति को दूँ, तो शायद अपने आपसे ही नाइंसाफी करूँगा।क्योंकि गलतियाँ तो मेरी ही थी।
फिर मिलेंगे दोस्त,
फिर मिलेंगे कहीं किसी और सफर में
फिर छोड़ेंगे यादें किसी और शहर में
चले तो इस बार भी थे मगर सागर सूखा था
अब जब मिलेंगे तो छोड़ेंगे नाव किसी और समंदर में।