आत्मा ,और जो हिस्सा उड़ जाता है उसे ही तुम आत्मा कह देते हो।

और जो हिस्सा उड़ जाता है उसे ही तुम आत्मा कह देते हो। हम पैदा घुमक्कड़ होते हैं।और जब मरते हैं तो घुमक्कड़ बाला हिस्सा हमसे आजाद होकर फिर निकल जाता है घूमने फिर कुछ नया एक्स्प्लोर करने ।किसी बच्चे को देखा है स्थिर से एक ही जगह सोते हुए? वो पूरा गोल चक्कर काटेगा। ज़िगजैग।पूरे बेड पर घूम घूम के मन भर जाए तो अगला लेवल एक्सप्लोर करने के लिए बेड से नीचे भी गिर सकता है।फिर लुढ़कते लुढ़कते पूरे कमरे का चक्कर भी काट सकता है।बचपन में हम फिरंट हुआ करते थे। हवा पर पाँव धर के उड़ते। झूले को सबसे ऊँचा ले जा कर वहाँ से कूद जाते। रेल की पटरी पर दूर दूर चलते जाते। घर की सिंगल ईंट वाली बाउंड्री वाल पर भी। पेड़ पर चढ़ जाते। छज्जे पर पाँव लटकाए बैठे रहते। हमें थिर होना नहीं आता था। हमारे पैर आवारा होते।एक जगह टिकना हम सीखते हैं। सबसे पहले तब, जब हमारे हाथ में कोई एक किताब आती है। हम उसे ख़त्म कर के बाहर भागना चाहते हैं। उम्र के साथ मज़े वाली किताब कम और ज़रूरी वाली किताब ज़्यादा पढ़ने लगते हैं। टेबल कुर्सी पर चिपक जाते हैं। सोफ़े पर पसर जाते हैं। फिर लैप्टॉप आता है तो उसके चार्जिंग केबल से बँध जाते हैं।कुछ लोगों की घुमक्कड़ी ख़त्म हो जाती है। मन, बदन से धुल जाती है उमर के साथ। हमारा लेकिन फिर भी मन ही नहीं, बदन भी बौराया बौराया फिरता है कि हमें कहीं होना है, कहीं जाना है… हम ज़िंदगी में ठहरते हैं तो सपनों में बऊआते चलते हैं। जहाँ तहाँ टऊआते। कितने सारे शहर।मरने के बाद हमें जलाया जाता है। चिता से राख इकट्ठा कर नदी में बहायी जाती है…

ग़ौर से देखोगे तो पाओगे, उसमें से हमारा घुमक्कड़ हिस्सा हवा में उड़ता जाता है। हमेशा के लिए। आज़ाद।

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तुम, हाँ तुम महज जिंदा हो तुम !

तुम, हाँ तुम
महज जिंदा हो तुम
तुम , हाँ तुम
महज जिंदा हो तुम
पर जिंदादिली की तमाम निशानियाँ
इंसां होने की कुल कहानियां
गवा चुके हो तुम,
वो दिन , जब एक इंसां
अपनी आंखों से मरते देखा था तुमने
और खिलखिला कर हँस रहे थे तुम
तुम महज जिंदा थे
आईने में नजरें मिला कर देखते खुदसे
वे-आवज़ मर रहे थे तुम
बेशक जिन्दा हो तुम
महज सांसे बाकी है,
चलती फिरती राहों में
खुद को जिंदा दिखलाते हो तुम,
सुनसान राहों में लफ्ज तुम्हारे भी सूख जाते हैं,
याद आता है वो मंजर
जब किसी जलती लाश पे आग फेक रहे थे तुम।
क्या बचा है तुममे
तुम महज जिंदा हो
पर जिंदादिली की तमाम निशानियाँ
इंसां होने की कुल कहानियां
गवा चुके हो तुम,