वो रात सिर्फ रात नहीं थी,
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
समन्दर था जज्बातों का और डूबना मुझको था,
चेहरे का हर कोना मद्धम लौ पर उफना था
ऑंखे आसमान में ,कानों की टकटकी फ़ोन पर थी
एक धीमी सी आवाज़ पड़ी थी कानों में
सुनो! ये मेरी आखिरी कॉल है,
और जैसे एक महीन कांटा दिल के आर पार था
ऑंखे डबडबायी होंठ मानो बिन गोंद ही चिपक गए थे
कहना बहुत कुछ था मगर मानो बस सुन रहा था
ये दिल को सुकूँ देने बाले अल्फ़ाज़ आज दिल को चुभ रहे थे
मानो हजारों जल्लाद लाखों भाले जिस्म में एक साथ घोंप रहे थे
अर्से से हर कदम जो लिबास थी मेरा
बस अगले ही पल किसी और की अमानत थी
वो रात सिर्फ रात नहीं थी
उसकी हर बात बस बात नहीं थी,
एक समंदर था जख्मों का और डूबना मुझको था
ऑंखे फफक पड़ीं चेहरा सराबोर था,
हर ख्वाब जो साथ बुने थे
टूटते तारों से टपक रहे थे
रुँधी आवाज़ और थोड़े खुले मुँह से
बस इतना ही निकला था
हमेशा खुश रहना,मेरे हिस्से की हर खुशी जी लेना।
यूँ तो तुम….
हमेशा मेरे ख़्वाबों में, मेरी साँसो में,मेरे एहसासों में
कैसे छीनेगा तुमको कोई
तुम तो बसती हो मेरे अल्फाजों में।
ये जति धर्म कीड़े कितना बाटेंगे तुमको हमसे
मैं इनको दिखला दूंगा कितनी मोहब्बत है तुमसे
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
बात बस इतनी सी
मोहब्बत तुमसे है और बस तुमसे ही रहेगी
वो जो घंटो हर रोज होती थीं बातें तुमसे
यूँ ही हर रोज मुक्कम्मल होगी।
बस फोन के दूसरी ओर नहीं तुम
मेरे अंदर सो बोलोगी।
अब दो नहीं चार लोग होंगे
डायरी पेन तुम और मैं।