कभी देखा है तुमने सड़क किनारे रेढ़ी पट्टी पर फल, चाट, मोमोज़, परांठे, खिलौने, गुब्बारे बेचती औरतों को? देखा ही होगा ये तो बेहद आम सी बात है फ़िर इसमें इतना ख़ास क्या है? खास ये है मेरे दोस्त की जरा याद करो कि कितनी दफा तुमने तेज रफ्तार गाड़ी से गुजरते या फिर ट्रैफिक की भीड़ में खड़े होकर उन्हें बेचारी समझ लिया होगा, कितनी बार तुम्हें उनको देखकर दया का भाव आया होगा, और कितनी बार तुम्हारे दिमाग में आया होगा कि आख़िर इनकी क्या मजबूरी होगी ये इस तरह से कम कु कर रहीं हैं। और इस तरह के भाव आना कोई असाधारण या औचक बात नहीं है क्योंकि जिस पितृसत्तात्मक समाज में हम रहते हैं इस तरह के विचार बहुत आम हो जाते हैं और हम भले कितने ही जागरूक या सतर्क क्यूँ ना हों फिर भी हम इस तरह के विचारों या भावों से नहीं बच पाते हैं। अब जरा सोचो कि कितनी बार जब तुमने दुनिया भर की तमाम पत्रिकाओं में औरतों के नाम को शीर्ष पर उकेरा गया देखा है तो तुम्हारा सीना गर्व से चौड़ा हो गया है और तुम्हें इस बात से कितनी खुशी मिली है और ऐसा होना बहुत साधारण है और होना भी चाहिए। क्योंकि जब हम किसी को शीर्ष पर देखते हैं तो तमाम बार हम ये भूल जाते हैं कि उसका जेंडर क्या है। फिर हम ये नहीं देखते की उन्होंने शुरू कहाँ से किया था उनके पास मौके कितने थे या फ़िर वो समाज के किस हिस्से से आतीं हैं। फिर जब हम औरतों को सड़क किनारे रेढ़ी पट्टी पर फल, चाट, मोमोज़, परांठे, खिलौने, गुब्बारे बेचते देखते हैं तो हमें उनको देखकर बेचारी जैसा ख्याल क्यूँ आता है? क्योंकि उनका नाम कहीं किसी पत्रिका में नहीं उकेरा गया है? उनके नाम की कहनियाँ कहीं पढ़ी नहीं गईं हैं? इन्हीं तमाम औरतों ने ना जाने कितने फ़ूड वेंचुरेस और तमाम दूसरे बिज़नेस खड़े कर दिए हैं। इतना लिखने का सार बस इतना है मेरे दोस्त, की ये औरतें मजबूर नहीं हैं और न हीं बेचारी हैं। बात बस इतनी सी है कि वो दुनिया की सहसी औरतों में से कुछ एक हैं। सबकी वज़हें अलग हो सकते हैं और उन वजहों को लांघ कर वो तुम्हारे बराबर खड़ीं हैं। इस मुल्क और समाज की व्यवस्थाओं ने उन्हें पहले वो मौके नहीं दिए या दिए भी तो उस बराबरी से नहीं दिए जितने पुरुषों को दिए गए पर फिर भी वो आज काम करने निकल पड़ीं हैं। तो मेरे दोस्त जब अगली बार तुम ऐसी औरतों को देखना तो उनको मजबूर मत समझना उन पर गर्व करना कि उन्होंने अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की ठान ली है और निकल पड़ीं हैं अपने हिस्से आये मौके को हाथ लेने और तुम्हारे बराबर खड़े होने को। बस फर्क इतना है कि उनका नाम किसी पत्रिका में नही उकेरा गया है और ना ही उन्हें किसी कहानी में जगह मिली है क्यों पत्रिकाओं के संपादक और पाठक शीर्ष पर उसका पर फिर भी वो तमाम हम जैसे लोगों की एक इंस्पिरेशन हैं। वो मजबूर नहीं, सहसी हैं।