तुम, हाँ तुम
महज जिंदा हो तुम
तुम , हाँ तुम
महज जिंदा हो तुम
पर जिंदादिली की तमाम निशानियाँ
इंसां होने की कुल कहानियां
गवा चुके हो तुम,
वो दिन , जब एक इंसां
अपनी आंखों से मरते देखा था तुमने
और खिलखिला कर हँस रहे थे तुम
तुम महज जिंदा थे
आईने में नजरें मिला कर देखते खुदसे
वे-आवज़ मर रहे थे तुम
बेशक जिन्दा हो तुम
महज सांसे बाकी है,
चलती फिरती राहों में
खुद को जिंदा दिखलाते हो तुम,
सुनसान राहों में लफ्ज तुम्हारे भी सूख जाते हैं,
याद आता है वो मंजर
जब किसी जलती लाश पे आग फेक रहे थे तुम।
क्या बचा है तुममे
तुम महज जिंदा हो
पर जिंदादिली की तमाम निशानियाँ
इंसां होने की कुल कहानियां
गवा चुके हो तुम,