आख़िर वो क्या हकीकत
जो मैं लिख नहीं पाता हूँ
एक ख्याल जहन में तेरा
जो मैं भूल नहीं पाता हूँ
कलम उठाऊँ लिखने को
ख़याल तेरा आ जाये
अब लड़ूँ कलम से या
तेरे ख़ावों में खो जाऊँ
तुझ जाने का ये रस्ता
अब सबसे बेहतर लगता है
बातें तुझसे कलम सहारे
अब यही हकीकत
लिखना अभी बहुत है तझको
पर कलम छूट रही हाथों से
डग मग डग मग
उँगलियाँ भी डोल रहीं हैं
आँखें पता पूँछ रहीं है
कर साहस फिर उँगलियों ने
इक और खत लिख डाला है,
पता तुम्हारा जो लिखने को आया
बस अपना दिल ही लिख पाता हूँ।
आख़िर वो क्या हकीकत
जो मैं लिख नहीं पाता हूँ।
कलम उठाकर
तुझ तक पहुँच तो जाता हूँ
बातें भी कर लेता हूँ
सवाल भी कर लेता हूँ
अब इससे बेहतर क्या होगा
जवाब भी मैं
खुद ही लिख लेता हूँ,
पर फिर वो क्या हकीकत
जो मैं लिख नहीं पता हूँ
ख़ावों से जागा तो
तुझको देख नहीं पाता हूँ,
आखिर वो क्या हकीकत
जो मैं लिख नहीं पाता हूँ।