मन में हैं नाथूराम जुबाँ पे गाँधी रखतेे हैं

मन में हैं नाथूराम
जुबाँ पे गाँधी रखतेे हैं,
चलना इनको गोड्से संग है
क्यों गाँधी गाँधी रटते हैं
हिंसा के हैं ये पुजारी
जाप अहिंसा
बस 2 अक्टूबर को जपते हैं।
मन में हैं नाथूराम
जुबाँ पे गाँधी रखतेे हैं,
है धर्म बिशेष से नफरत इनको
और राग धर्म का जपते हैं,
है नफरत इनको कित्ताबों से भी
पढ़ने लिखने के भी ये विरोधी
और जिसने ये सारा संसार बनाया
उसकी रक्षा के ये पहरेदार बनते हैं,
इंसानों से प्रेम कहाँ इनको
इनके दर पे तो
हत्यारों के सर भी
फूलों के ताज सजते हैं।
हिंसा के हैं ये पुजारी
जाप अहिंसा
बस 2 अक्टूबर को जपते हैं।
हैं गायों के भी ये बड़े पुजारी
पर ख़ुद के घर में
इक भी ना गाय रखते हैं।
मन में हैं नाथूराम
जुबाँ पे गाँधी रखतेे हैं,
चलना इनको गोड्से संग है।

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