वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
है खौफ अंधेरों से उसको
पर बयाँ वो करता नहीं
डरता है कुछ इसकदर
की धड़कने छोड़ दिल
पेट को उतर जाता है।
आ गया जो इक पैगाम
उसके शहर नए मुसाफिर
उम्र पूरी कर वो अपनी
छोड़ सूना शहर
इक नए सफर जाता है।
वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
बिदाई में आती है बारात उसके
शहर के नन्हें परिंदों की
जो रोकना तो उसको सब चाहें
पर अब उसको जाना है
जाते जाते फिर लौटने का
वादा वो कर जाता है।
भोर हुई वो लौट आता है
वो नहीं तो उसका
हमशक्ल आता है
फिर उम्मीद से भर
सारा शहर जाता है।
पर परिंदे का क्या
आता है जाता है
हर बार निकल
किसी नए सफर जाता है।
वक्त के शहर का इक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
बिदाई में आती है बारात उसके
शहर के नन्हें परिंदों की
जो रोकना तो उसको सब चाहें
पर अब उसको जाना है
जाते जाते फिर लौटने का
वादा वो कर जाता है।
वक्त के शहर का एक परिंदा
हर शाम गुजर जाता है।
@ThePoetryHouse
बहुत ख़ूब
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शुक्रिया जनाब
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