फूल भी देखो कितने fool बन रहे हैं।

बेचारे फूल भी देखो
कितने फूल बन रहे हैं।
ज्ञानी हो या अज्ञानी
शाही हो या अपराधी
गूँथ मालाओं में सबके
गले का हार बन रहे हैं।
वे जान हैं वे जुबान हैं
पर उनका भी तो
अपना स्वाभिमान है
कुछ कह नहीं सकते
कुछ कर नहीं सकते
है क्रोध की लालिमा
कण कण में भर गई पर
अपने ग़ुस्से का इजहार
बस मुरझाकर कर रहे हैं।
बेचारे फूल भी देखो
कितने फूल बन रहे हैं।
ये चलते फिरते माटी के पुतले
जो कुदरत से जंग का
आहवान कर रहे हैं
ये घोर कलयुग का प्रतीक है
गुँथी मालाओं की महफ़िल में
चर्चा ये फूल सारे
सरे – आम कर रहे हैं।

@ThePoetryHouse

Leave a comment