इक भोर देखा था
चेहरे पर कुछ काली
घटाओं के पहरे
और होंठ पर चमकता
इक काला तिल
खुदा ने जमीं पे
ये फूल क्या लाजबाव खिलाया है।
फ़िर नौबत मुलाकात की
आती भी कैसे
खाबों में ही उस शख़्स को रब नें
वे-हिसाब मिलाया है।
सिलसिला बातों का जारी है
कुछ इस तरह
एहसास उनकी ख़ामोश आँख़ों का
मैंने अपने लफ़्ज़ों में पाया है।
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