
किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
रेगिस्तान में भी बर्फ जमाए बैठे हैं।
कोई अपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कभी-सर्द,कभी-गर्म, कभी-तल्ख,कभी-नर्म
ये बेहोश दिन बस यूँ ही गुजर रहे हैं।
सूरज ढला दिन की लालिमा खोने को है,
एक वक्त की भूख फिर दफ़न होने को है,
और जेब में चार ही पैसे खनके हैं,पर
घर पे कुछ चेहरे उम्मीद का चूल्हा जलाए बैठे हैं।
दो पैसे छिपाकर खुद ही खुद से बेटी को बचा लिए
और भूखे पेट की तल्ख़ी पत्थर तले दवाए बैठे हैं।
वो रेगिस्तान में भी वर्फ़ जमाए बैठे हैं।
वो किरदार खुद में कितने समाए बैठे हैं।
कोई आपनेपन से आकर पूछे तो जरा
हाल क्या है?
आब-ए-चश्म के समंदर बहाए बैठे हैं।
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