आखिर क्या कुछ जानकर
कल से बेहतर हो गए
या बेख़बर हैं इस बात से
कि आज बद से बदत्तर हो गए।
अख्तर हर आँख के थे जो
क्या इल्म भी है इस बात का
सूरज ढला और बद-अख्तर हो गए।
किस हकीकत को ढूंढ़ने निकले हैं
और किस हकीकत से दूर हो गए
जो मसहूर थे अपनी खुद्दारी से
आखिर क्या बजह कि मजबूर हो गए।
खुदा जाने खुद भी ख़ुद में कहीं जिंदा हैं
या तलाश में खुद की खुद से ही दूर हो गए।
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