ये कैसी हकीकत जिंदा हूँ मैं।

ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं
अब खुद से ही
शर्मिंदा हूँ मैं
ठहरा वक्त का पाबंद
पर वक्त ठहरा कहाँ
कभी जाबांज मुसाफिर
अब वे जान परिंदा हूँ मैं
ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं,
गला घोंट दूँ खुद का
पी जाऊँ खून भी
अब बो दरिंदा हूँ मैं
अब खुद से ही
शर्मिंदा हूँ मैं,
चला था कई
हसीन ख़्वाब लेकर
कुछ नग्न आँखों को
उम्मीद की लौ देकर
अब माटी सा मौन
बस जुर्मों का
पुलिंदा हूँ मैं,
ये मजबूर सियासत
ठुकरा ही चुकी हैं
खुदा भी मुकर जाए
अपनी जमानत से
वो अश्क़िया इंसान
चुनिंदा हूँ मैं
ये कैसी हकीकत
जिंदा हूँ मैं।

@विकासडायरी

Leave a comment