प्रेमचंद्र एक झलक में

कलम से इस अज़ीम योद्धा को नमन।
सोचता हूँ कितना दर्द रहा होगा
जो आँसू बनकर
बूँद-बूँद कलम से बहा होगा,
जब पूस की रात लिखा होगा।
रूबरू इस वहशी जमात से
कितना बेहतर रहा होगा
जब तहरीर सा अज़ाब
लफ्जों से शब्दों में ढहा होगा।
पढ़ा होगा सियासत के हर पहलू को
कितना खोद खोद कर
यूँ ही नहीं नमक का दरोगा कहा होगा।
कितने करीब से जिया होगा
उस मजलूम गरीबी को
कि सवा सेर गेंहूँ का कर्ज
भी ताउम्र चुकाता रहा होगा।
गुजरी सारी जिंदगी चीथड़ों में
मौत पर भी जो अपनो की
दो गज कफ़न ना अदा कर सका होगा।
और उसी दौर में लिख रहा था वो
ईदगाह सी महफूज़ इंसानियत
और ज्योति सा ममता का राग
बाकई माँ हिंदी को जीने बाला
वो अदभुत शख़्स
कितना अज़ीम रहा होगा।

@विकास डायरी

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