सुनो कलम बोल रही है।

सुनो!कलम बोल रही है,
पर दोष मुझे मत देना तुम
अपने गहरे दबे राज
ये खुद खोल रही है
सुनो!कलम बोल रही है।
तन्हां अक्स मेरा अब
कलम ओढ़ लेता है
है खुद भी तन्हा पर
आँसू मिरे झेल रही है।
बहुत लिखा इसने हमको
कमबख्त बस तुम्हें लिख रही है
तुम्हारे गर्म हाथों की नरमी
खफ़ा है एक अरसे से
बेचैन कलम लिपट कर
खामोश अक्स से मेरे
इंतजार के रंग का
हर अफ़साना लिख रही है
ख़ामोश सिले होंठो को
अब ये खोल रही है
सुनो!कलम बोल रही है।

@विकासडायरी